महाभारत 12.163.2
सामुद्रकान्स वणिजस्ततोऽपश्यत्स्थितान्पथिस तेन सार्थेन सह प्रययौ सागरं प्रति
sāmudrakānsa vaṇijastato'paśyatsthitānpathisa tena sārthena saha prayayau sāgaraṃ prati
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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