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महाभारत 12.166.5
ततोऽन्यस्मिन्गते चाह्नि विरूपाक्षोऽब्रवीत्सुतम्न प्रेक्षे राजधर्माणमद्य पुत्र खगोत्तमम्
tato'nyasmingate cāhni virūpākṣo'bravītsutamna prekṣe rājadharmāṇamadya putra khagottamam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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