महाभारत 12.169.22
जातमेवान्तकोऽन्ताय जरा चान्वेति देहिनम्अनुषक्ता द्वयेनैते भावाः स्थावरजङ्गमाः
jātamevāntako'ntāya jarā cānveti dehinamanuṣaktā dvayenaite bhāvāḥ sthāvarajaṅgamāḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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