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महाभारत 12.182.10
नित्यं क्रोधात्तपो रक्षेच्छ्रियं रक्षेत मत्सरात्विद्यां मानावमानाभ्यामात्मानं तु प्रमादतः
nityaṃ krodhāttapo rakṣecchriyaṃ rakṣeta matsarātvidyāṃ mānāvamānābhyāmātmānaṃ tu pramādataḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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