महाभारत 12.185.7
भरद्वाज उवाच · bharadvāja uvāca
अस्माल्लोकात्परो लोकः श्रूयते नोपलभ्यतेतमहं ज्ञातुमिच्छामि तद्भवान्वक्तुमर्हति
asmāllokātparo lokaḥ śrūyate nopalabhyatetamahaṃ jñātumicchāmi tadbhavānvaktumarhati
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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