महाभारत 12.185.9
तत्र ह्यपापकर्माणः शुचयोऽत्यन्तनिर्मलाःलोभमोहपरित्यक्ता मानवा निरुपद्रवाः
tatra hyapāpakarmāṇaḥ śucayo'tyantanirmalāḥlobhamohaparityaktā mānavā nirupadravāḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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