महाभारत 12.192.101
विकृत उवाच · vikṛta uvāca
मयास्य दत्तं राजर्षे गृह्णीयां तत्कथं पुनःकाममत्रापराधो मे दण्ड्यमाज्ञापय प्रभो
mayāsya dattaṃ rājarṣe gṛhṇīyāṃ tatkathaṃ punaḥkāmamatrāparādho me daṇḍyamājñāpaya prabho
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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