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महाभारत 12.192.70
सत्ये कुरु स्थिरं भावं मा राजन्ननृतं कृथाःकस्मात्त्वमनृतं वाक्यं देहीति कुरुषेऽशुभम्
satye kuru sthiraṃ bhāvaṃ mā rājannanṛtaṃ kṛthāḥkasmāttvamanṛtaṃ vākyaṃ dehīti kuruṣe'śubham
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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