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महाभारत 12.192.74
ब्राह्मण उवाच · brāhmaṇa uvāca
न छन्दयामि ते राजन्नापि ते गृहमाव्रजम्इहागम्य तु याचित्वा न गृह्णीषे पुनः कथम्
na chandayāmi te rājannāpi te gṛhamāvrajamihāgamya tu yācitvā na gṛhṇīṣe punaḥ katham
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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