महाभारत 12.192.80
राजोवाचयदि विप्र निसृष्टं ते जप्यस्य फलमुत्तमम्आवयोर्यत्फलं किंचित्सहितं नौ तदस्त्विह
rājovācayadi vipra nisṛṣṭaṃ te japyasya phalamuttamamāvayoryatphalaṃ kiṃcitsahitaṃ nau tadastviha
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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