महाभारत 12.192.86
तावुभौ भृशसंतप्तौ राजानमिदमूचतुःपरीक्ष्यतां यथा स्याव नावामिह विगर्हितौ
tāvubhau bhṛśasaṃtaptau rājānamidamūcatuḥparīkṣyatāṃ yathā syāva nāvāmiha vigarhitau
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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