महाभारत 12.203.39
अग्निर्दारुगतो यद्वद्भिन्ने दारौ न दृश्यतेतथैवात्मा शरीरस्थो योगेनैवात्र दृश्यते
agnirdārugato yadvadbhinne dārau na dṛśyatetathaivātmā śarīrastho yogenaivātra dṛśyate
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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