महाभारत 12.205.7
यश्चाधर्मं चरेन्मोहात्कामलोभावनु प्लवन्धर्म्यं पन्थानमाक्रम्य सानुबन्धो विनश्यति
yaścādharmaṃ carenmohātkāmalobhāvanu plavandharmyaṃ panthānamākramya sānubandho vinaśyati
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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