महाभारत 12.210.35
विकारं प्रकृतिं चैव पुरुषं च सनातनम्यो यथावद्विजानाति स वितृष्णो विमुच्यते
vikāraṃ prakṛtiṃ caiva puruṣaṃ ca sanātanamyo yathāvadvijānāti sa vitṛṣṇo vimucyate
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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