महाभारत 12.212.40
एवमाहुः समाहारं क्षेत्रमध्यात्मचिन्तकाःस्थितो मनसि यो भावः स वै क्षेत्रज्ञ उच्यते
evamāhuḥ samāhāraṃ kṣetramadhyātmacintakāḥsthito manasi yo bhāvaḥ sa vai kṣetrajña ucyate
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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