महाभारत 12.216.3
पितामहमुपागत्य प्रणिपत्य कृताञ्जलिःसर्वानेवासुराञ्जित्वा बलिं पप्रच्छ वासवः
pitāmahamupāgatya praṇipatya kṛtāñjaliḥsarvānevāsurāñjitvā baliṃ papraccha vāsavaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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