महाभारत 12.218.28
श्रीरुवाचएष मे निहितः पादो योऽयं सत्सु प्रतिष्ठितःएवं विनिहितां शक्र भूतेषु परिधत्स्व माम्
śrīruvācaeṣa me nihitaḥ pādo yo'yaṃ satsu pratiṣṭhitaḥevaṃ vinihitāṃ śakra bhūteṣu paridhatsva mām
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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