महाभारत 12.22.2
क्षत्रधर्मेण धर्मज्ञ प्राप्य राज्यमनुत्तमम्जित्वा चारीन्नरश्रेष्ठ तप्यते किं भवान्भृशम्
kṣatradharmeṇa dharmajña prāpya rājyamanuttamamjitvā cārīnnaraśreṣṭha tapyate kiṃ bhavānbhṛśam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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