महाभारत 12.221.55
मातरं पितरं वृद्धमाचार्यमतिथिं गुरुम्गुरुवन्नाभ्यनन्दन्त कुमारान्नान्वपालयन्
mātaraṃ pitaraṃ vṛddhamācāryamatithiṃ gurumguruvannābhyanandanta kumārānnānvapālayan
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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