महाभारत 12.222.5
न प्रीयसे वन्द्यमानो निन्द्यमानो न कुप्यसिका ते प्रज्ञा कुतश्चैषा किं चैतस्याः परायणम्
na prīyase vandyamāno nindyamāno na kupyasikā te prajñā kutaścaiṣā kiṃ caitasyāḥ parāyaṇam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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