महाभारत 12.224.50
केचित्पुरुषकारं तु प्राहुः कर्मविदो जनाःदैवमित्यपरे विप्राः स्वभावं भूतचिन्तकाः
kecitpuruṣakāraṃ tu prāhuḥ karmavido janāḥdaivamityapare viprāḥ svabhāvaṃ bhūtacintakāḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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