महाभारत 12.231.14
आश्रयो नास्ति सत्त्वस्य गुणशब्दो न चेतनासत्त्वं हि तेजः सृजति न गुणान्वै कदाचन
āśrayo nāsti sattvasya guṇaśabdo na cetanāsattvaṃ hi tejaḥ sṛjati na guṇānvai kadācana
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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