महाभारत 12.232.21
प्रमोहो भ्रम आवर्तो घ्राणश्रवणदर्शनेअद्भुतानि रसस्पर्शे शीतोष्णे मारुताकृतिः
pramoho bhrama āvarto ghrāṇaśravaṇadarśaneadbhutāni rasasparśe śītoṣṇe mārutākṛtiḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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