महाभारत 12.236.6
नियतो नियताहारः षष्ठभक्तोऽप्रमादवान्तदग्निहोत्रं ता गावो यज्ञाङ्गानि च सर्वशः
niyato niyatāhāraḥ ṣaṣṭhabhakto'pramādavāntadagnihotraṃ tā gāvo yajñāṅgāni ca sarvaśaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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