महाभारत 12.242.13
लोभमोहतृणच्छन्नां कामक्रोधसरीसृपाम्सत्यतीर्थानृतक्षोभां क्रोधपङ्कां सरिद्वराम्
lobhamohatṛṇacchannāṃ kāmakrodhasarīsṛpāmsatyatīrthānṛtakṣobhāṃ krodhapaṅkāṃ saridvarām
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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