महाभारत 12.251.5
अलब्ध्वा निपुणं धर्मं पापः पापे प्रसज्जतिन च पापकृतः पापान्मुच्यन्ते केचिदापदि
alabdhvā nipuṇaṃ dharmaṃ pāpaḥ pāpe prasajjatina ca pāpakṛtaḥ pāpānmucyante kecidāpadi
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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