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महाभारत 12.253.27
अण्डेभ्यस्त्वथ पुष्टेभ्यः प्रजायन्त शकुन्तकाःव्यवर्धन्त च तत्रैव न चाकम्पत जाजलिः
aṇḍebhyastvatha puṣṭebhyaḥ prajāyanta śakuntakāḥvyavardhanta ca tatraiva na cākampata jājaliḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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