महाभारत 12.255.19
अखिलं दैवतं सर्वं ब्रह्म ब्राह्मणसंश्रितम्तृप्यन्ति तृप्यतो देवास्तृप्तास्तृप्तस्य जाजले
akhilaṃ daivataṃ sarvaṃ brahma brāhmaṇasaṃśritamtṛpyanti tṛpyato devāstṛptāstṛptasya jājale
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें