महाभारत 12.255.26
स्वमेव चार्थं कुर्वाणा यज्ञं चक्रुः पुनर्द्विजाःपरिनिष्ठितकर्माणः प्रजानुग्रहकाम्यया
svameva cārthaṃ kurvāṇā yajñaṃ cakruḥ punardvijāḥpariniṣṭhitakarmāṇaḥ prajānugrahakāmyayā
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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