महाभारत 12.258.72
चिरं वृद्धानुपासीत चिरमन्वास्य पूजयेत्चिरं धर्मान्निषेवेत कुर्याच्चान्वेषणं चिरम्
ciraṃ vṛddhānupāsīta ciramanvāsya pūjayetciraṃ dharmānniṣeveta kuryāccānveṣaṇaṃ ciram
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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