महाभारत 12.262.35
एकत्वे च पृथक्त्वे च विशेषो नान्य उच्यतेतद्यथावद्यथान्यायं भगवान्प्रब्रवीतु मे
ekatve ca pṛthaktve ca viśeṣo nānya ucyatetadyathāvadyathānyāyaṃ bhagavānprabravītu me
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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