महाभारत 12.263.12
आशायास्तनयोऽधर्मः क्रोधोऽसूयासुतः स्मृतःपुत्रो लोभो निकृत्यास्तु कृतघ्नो नार्हति प्रजाम्
āśāyāstanayo'dharmaḥ krodho'sūyāsutaḥ smṛtaḥputro lobho nikṛtyāstu kṛtaghno nārhati prajām
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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