महाभारत 12.277.3
सगर उवाच · sagara uvāca
किं श्रेयः परमं ब्रह्मन्कृत्वेह सुखमश्नुतेकथं न शोचेन्न क्षुभ्येदेतदिच्छामि वेदितुम्
kiṃ śreyaḥ paramaṃ brahmankṛtveha sukhamaśnutekathaṃ na śocenna kṣubhyedetadicchāmi veditum
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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