महाभारत 12.285.5
वक्त्राद्भुजाभ्यामूरुभ्यां पद्भ्यां चैवाथ जज्ञिरेसृजतः प्रजापतेर्लोकानिति धर्मविदो विदुः
vaktrādbhujābhyāmūrubhyāṃ padbhyāṃ caivātha jajñiresṛjataḥ prajāpaterlokāniti dharmavido viduḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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