महाभारत 12.286.34
यो दुर्लभतरं प्राप्य मानुष्यमिह वै नरःधर्मावमन्ता कामात्मा भवेत्स खलु वञ्च्यते
yo durlabhataraṃ prāpya mānuṣyamiha vai naraḥdharmāvamantā kāmātmā bhavetsa khalu vañcyate
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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