महाभारत 12.29.115
उपातिष्ठन्त पशवः स्वयं तं संशितव्रतम्ग्राम्यारण्या महात्मानं रन्तिदेवं यशस्विनम्
upātiṣṭhanta paśavaḥ svayaṃ taṃ saṃśitavratamgrāmyāraṇyā mahātmānaṃ rantidevaṃ yaśasvinam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें