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महाभारत 12.29.17
यः स्पर्धामनयच्छक्रं देवराजं शतक्रतुम्शक्रप्रियैषी यं विद्वान्प्रत्याचष्ट बृहस्पतिःसंवर्तो याजयामास यं पीडार्थं बृहस्पतेः
yaḥ spardhāmanayacchakraṃ devarājaṃ śatakratumśakrapriyaiṣī yaṃ vidvānpratyācaṣṭa bṛhaspatiḥsaṃvarto yājayāmāsa yaṃ pīḍārthaṃ bṛhaspateḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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