महाभारत 12.291.5
त्वयि प्रतिगते श्रेयः कुतः श्रोष्यामहे वयम्कुरुवंशप्रदीपस्त्वं ज्ञानद्रव्येण दीप्यसे
tvayi pratigate śreyaḥ kutaḥ śroṣyāmahe vayamkuruvaṃśapradīpastvaṃ jñānadravyeṇa dīpyase
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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