महाभारत 12.295.32
सहवासं न यास्यामि कालमेतद्धि वञ्चनात्वञ्चितोऽस्म्यनया यद्धि निर्विकारो विकारया
sahavāsaṃ na yāsyāmi kālametaddhi vañcanātvañcito'smyanayā yaddhi nirvikāro vikārayā
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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