महाभारत 12.297.15
सत्कृता चैकपत्नी च जात्या योनिरिहेष्यतेऋग्यजुःसामगो विद्वान्षट्कर्मा पात्रमुच्यते
satkṛtā caikapatnī ca jātyā yoniriheṣyateṛgyajuḥsāmago vidvānṣaṭkarmā pātramucyate
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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