महाभारत 12.306.44
अक्षयत्वात्प्रजनने अजमत्राहुरव्ययम्अक्षयं पुरुषं प्राहुः क्षयो ह्यस्य न विद्यते
akṣayatvātprajanane ajamatrāhuravyayamakṣayaṃ puruṣaṃ prāhuḥ kṣayo hyasya na vidyate
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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