महाभारत 12.31.13
सृञ्जय उवाच · sṛñjaya uvāca
प्रीतौ भवन्तौ यदि मे कृतमेतावता ममएष एव परो लाभो निर्वृत्तो मे महाफलः
prītau bhavantau yadi me kṛtametāvatā mamaeṣa eva paro lābho nirvṛtto me mahāphalaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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