महाभारत 12.31.29
एवमुक्तस्तु शक्रेण वज्रः परपुरंजयःकुमारस्यान्तरप्रेक्षी नित्यमेवान्वपद्यत
evamuktastu śakreṇa vajraḥ parapuraṃjayaḥkumārasyāntaraprekṣī nityamevānvapadyata
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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