महाभारत 12.310.7
तपोमूलमिदं सर्वं यन्मां पृच्छसि पाण्डवतदिन्द्रियाणि संयम्य तपो भवति नान्यथा
tapomūlamidaṃ sarvaṃ yanmāṃ pṛcchasi pāṇḍavatadindriyāṇi saṃyamya tapo bhavati nānyathā
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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