महाभारत 12.313.16
वेदानधीत्य नियतो दक्षिणामपवर्ज्य चअभ्यनुज्ञामथ प्राप्य समावर्तेत वै द्विजः
vedānadhītya niyato dakṣiṇāmapavarjya caabhyanujñāmatha prāpya samāvarteta vai dvijaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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