महाभारत 12.315.26
अपृच्छत्पितरं ब्रह्मन्कुतो वायुरभूदयम्आख्यातुमर्हति भवान्वायोः सर्वं विचेष्टितम्
apṛcchatpitaraṃ brahmankuto vāyurabhūdayamākhyātumarhati bhavānvāyoḥ sarvaṃ viceṣṭitam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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