महाभारत 12.318.35
इति लोकमनाक्रन्दं मोहशोकपरिप्लुतम्स्रोतसा सहसा क्षिप्तं ह्रियमाणं बलीयसा
iti lokamanākrandaṃ mohaśokapariplutamsrotasā sahasā kṣiptaṃ hriyamāṇaṃ balīyasā
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें