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महाभारत 12.318.48
ततो मुहूर्तं संचिन्त्य निश्चितां गतिमात्मनःपरावरज्ञो धर्मस्य परां नैःश्रेयसीं गतिम्
tato muhūrtaṃ saṃcintya niścitāṃ gatimātmanaḥparāvarajño dharmasya parāṃ naiḥśreyasīṃ gatim
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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