महाभारत 12.318.52
न तु योगमृते शक्या प्राप्तुं सा परमा गतिःअवबन्धो हि मुक्तस्य कर्मभिर्नोपपद्यते
na tu yogamṛte śakyā prāptuṃ sā paramā gatiḥavabandho hi muktasya karmabhirnopapadyate
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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