महाभारत 12.318.6
व्यत्ययो ह्ययमत्यन्तं पक्षयोः शुक्लकृष्णयोःजातं मर्त्यं जरयति निमेषं नावतिष्ठते
vyatyayo hyayamatyantaṃ pakṣayoḥ śuklakṛṣṇayoḥjātaṃ martyaṃ jarayati nimeṣaṃ nāvatiṣṭhate
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें